यूनीक होम्स फ़ॉर गर्ल्स' की आलीशान इमारत के सामने घास के मैदान पर
नंगे पांव टहलते हुए कमर पर हाथ रख कहती हैं, "मैंनूं छेड़ न, मैं बहुत
पक्क गई हैं, पहलां मैनूं दस्स कि मुज़्ज़फरपुर वाले आदमी नू सज़ा होएगी या
नहीं?"
फिर कहती हैं, "मन करदा ए किते दूर चली जांवां ते वाहेगुरु दा नाम जपां..."
मेरे सवालों पर वो कहती हैं, "मेरे पास तेरे हर सवाल का ये जवाब है कि यतीमख़ानों में छोटी लड़कियां बेची जा रही हैं और बड़ी लड़कियों का यौन शोषण हो रहा है, बस इससे आगे मुझसे बात न कर."
26 साल से प्रकाश कौर पंजाब के जालंधर में इस यूनीक होम के ज़रिए अनाथ और छोड़ दी गई बच्चियों को घर और मां का प्यार दे रही हैं. प्रकाश कौर की अपनी ज़िंदगी भी यतीमखाने में बीती है. जाब के यतीमख़ाने यहां के समाज में दशकों से बेटियों के लिए अनिच्छा के गवाह रहे हैं. जालंधर के यूनीक होम्स फ़ॉर गर्ल्स में 60 लड़कियां हैं. बीबी प्रकाश कौर अपने पर्स से एक तस्वीर निकाल कर मेरे सामने रखती हैं और कहती हैं, "ऐ मेरी रूबा (बदला हुआ नाम), ऐ देख, ऐ अनाथ ऐ? कपड़े देख इसदे."
रूबा लंदन में पढ़ाई कर रही हैं. फिर वह मेरे सामने तस्वीरों के ढेर लगा देती हैं और कहती हैं मैंने तो अपने बच्चों की शॉपिंग भी कभी इंडिया से नहीं की.
बातचीत के दौरान दो महिलाएं आती हैं. प्रकाश कौर उन्हें आलू-प्याज़ छीलने का निर्देश देती हैं. मैंने पूछा कि आज आलू-प्याज़ की सब्ज़ी बनेगी? कहने लगीं- नहीं, बारिश का मौसम है, बच्चियां पकौड़े खाने के लिए बोल रही हैं.
यूनीक होम समेत पंजाब के तमाम यतीमख़ानों की यह एकतरफ़ा तस्वीर है. पंजाब के मुख्य शहरों के यतीमखानों का दौरा करने पर देखा कि शानदार इमारतें, बच्चों के लिए अच्छा खाना, रहने की अच्छी व्यवस्था, करियर काउंसलर का आना, पीटीएम में जाना, नियम से हेल्थ चेकअप और उनकी पढ़ाई-लिखाई में ठीक है.
कुछ अपवाद ज़रूर हैं. फ़ंडिंग के ख़र्च में गड़बड़ी को लेकर कई यतीमख़ाने चर्चा में आते रहे हैं लेकिन यह चमचमाती तस्वीर एकतरफ़ा है.
तस्वीर का दूसरा पहलू स्याह है. वो यह है कि पंजाब में पैदा होने के बाद सुनसान जगहों पर, झाड़ियों में, कूड़ेदानों में रोज़ नवजात लड़कियों को फेंकें जाने की ख़बरें पढ़ने को मिलती हैं. ये लड़कियां पुलिस या हेल्प लाइन की ओर से इन यतीमख़ानों में भेजी जाती हैं तो कुछ लोग सीधे इनके बाहर लगे पालनों में बेटियों को सुला जाते हैं.
पंजाब में वर्ष 2001 में सीएसआर (चाइल्ड सेक्स रेशियो) 798 था जो वर्ष 2011 में बढ़कर 846 हो गया. आंकड़ें बेशक बदल गए हैं लेकिन बेटियों को फेंकने की मानसिकता में ख़ास फर्क़ नहीं आया है.
लुधियाना के तलवंडी खुर्द गांव में स्वामी गंगानंद जी भूरी वाले इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन का यतीमख़ाना देश-विदेश में मशहूर है.
यहां के पालने में बेटियां तो हैं ही लेकिन ऐसे बेटे भी हैं जिन्हें बीमारी के चलते उनके 'मां-बाप ने फेंक दिया'. इसे चलाने वाले सरदार कुलदीप सिंह और बीबी जसबीर कौर छह महीने के सुमेल को पालने से उठा लेते हैं.
जसबीर कौर कहती हैं 'इसे फेंक दिया गया था क्योंकि इसके फेफड़ों में इंफेक्शन था. इलाज पर पांच लाख रुपये ख़र्च हुए, इसलिए हम सब इसे आश्रम का पंजलक्खा हार कहते हैं.'
यहां रहने वाले सुमेल और बलबीर लाइलाज बीमारी से पीड़ित हैं.
पालने में पड़ी तीन दिन की वंदना लुधियाना के पास डाबा में एक कूड़ेदान में पाई गई. उसकी आंखें नहीं हैं. सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक 12 साल की लड़की ने एक बेटी को जन्म दिया तो उसका परिवार बच्ची को यहां छोड़ गया.
दो दिन की प्रभसीरत को पडियाला में उसके परिवार ने एक कूड़ेदान के पास फेंक दिया. उसकी भी आंखें नहीं हैं.
अरमान के पालने के पास खड़े हो जाओ तो आप उसे गोद में लिए बिना रह ही नहीं सकते क्योंकि वो किसी को देखते ही पालने से बाहर निकलने की कोशिश करती है. गोद में आते ही उसकी बांछें खिल जाती हैं. इसके पिता उसे एक मोहल्ले के खाली प्लॉट में फेंक गए थे क्योंकि उनके पहले से दो बेटियां और एक बेटा था.
मनतेज नाम के लड़के को रेलवे स्टेशन पर एक बच्चा चोरी गैंग बेच रहा था तो पुलिस ने उन्हें धर लिया. वह तीन साल से यहां है.
खेतों में मक्के की लहलहाती फसल के बीचों बीच बने इस यतीमखाने में 47 बच्चे हैं. यहां बड़े लड़कों को नहीं लिया जाता है. इनमें तीन लड़के हैं और बाकी लड़कियां. ज़्यादातर बच्चों की आंखों में सपने और ऊर्जा देखकर लगता है कि कुछ करने के लिए ज़रूरी नहीं कि चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुआ जाए.
फिर कहती हैं, "मन करदा ए किते दूर चली जांवां ते वाहेगुरु दा नाम जपां..."
मेरे सवालों पर वो कहती हैं, "मेरे पास तेरे हर सवाल का ये जवाब है कि यतीमख़ानों में छोटी लड़कियां बेची जा रही हैं और बड़ी लड़कियों का यौन शोषण हो रहा है, बस इससे आगे मुझसे बात न कर."
26 साल से प्रकाश कौर पंजाब के जालंधर में इस यूनीक होम के ज़रिए अनाथ और छोड़ दी गई बच्चियों को घर और मां का प्यार दे रही हैं. प्रकाश कौर की अपनी ज़िंदगी भी यतीमखाने में बीती है. जाब के यतीमख़ाने यहां के समाज में दशकों से बेटियों के लिए अनिच्छा के गवाह रहे हैं. जालंधर के यूनीक होम्स फ़ॉर गर्ल्स में 60 लड़कियां हैं. बीबी प्रकाश कौर अपने पर्स से एक तस्वीर निकाल कर मेरे सामने रखती हैं और कहती हैं, "ऐ मेरी रूबा (बदला हुआ नाम), ऐ देख, ऐ अनाथ ऐ? कपड़े देख इसदे."
रूबा लंदन में पढ़ाई कर रही हैं. फिर वह मेरे सामने तस्वीरों के ढेर लगा देती हैं और कहती हैं मैंने तो अपने बच्चों की शॉपिंग भी कभी इंडिया से नहीं की.
बातचीत के दौरान दो महिलाएं आती हैं. प्रकाश कौर उन्हें आलू-प्याज़ छीलने का निर्देश देती हैं. मैंने पूछा कि आज आलू-प्याज़ की सब्ज़ी बनेगी? कहने लगीं- नहीं, बारिश का मौसम है, बच्चियां पकौड़े खाने के लिए बोल रही हैं.
यूनीक होम समेत पंजाब के तमाम यतीमख़ानों की यह एकतरफ़ा तस्वीर है. पंजाब के मुख्य शहरों के यतीमखानों का दौरा करने पर देखा कि शानदार इमारतें, बच्चों के लिए अच्छा खाना, रहने की अच्छी व्यवस्था, करियर काउंसलर का आना, पीटीएम में जाना, नियम से हेल्थ चेकअप और उनकी पढ़ाई-लिखाई में ठीक है.
कुछ अपवाद ज़रूर हैं. फ़ंडिंग के ख़र्च में गड़बड़ी को लेकर कई यतीमख़ाने चर्चा में आते रहे हैं लेकिन यह चमचमाती तस्वीर एकतरफ़ा है.
तस्वीर का दूसरा पहलू स्याह है. वो यह है कि पंजाब में पैदा होने के बाद सुनसान जगहों पर, झाड़ियों में, कूड़ेदानों में रोज़ नवजात लड़कियों को फेंकें जाने की ख़बरें पढ़ने को मिलती हैं. ये लड़कियां पुलिस या हेल्प लाइन की ओर से इन यतीमख़ानों में भेजी जाती हैं तो कुछ लोग सीधे इनके बाहर लगे पालनों में बेटियों को सुला जाते हैं.
पंजाब में वर्ष 2001 में सीएसआर (चाइल्ड सेक्स रेशियो) 798 था जो वर्ष 2011 में बढ़कर 846 हो गया. आंकड़ें बेशक बदल गए हैं लेकिन बेटियों को फेंकने की मानसिकता में ख़ास फर्क़ नहीं आया है.
लुधियाना के तलवंडी खुर्द गांव में स्वामी गंगानंद जी भूरी वाले इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन का यतीमख़ाना देश-विदेश में मशहूर है.
यहां के पालने में बेटियां तो हैं ही लेकिन ऐसे बेटे भी हैं जिन्हें बीमारी के चलते उनके 'मां-बाप ने फेंक दिया'. इसे चलाने वाले सरदार कुलदीप सिंह और बीबी जसबीर कौर छह महीने के सुमेल को पालने से उठा लेते हैं.
जसबीर कौर कहती हैं 'इसे फेंक दिया गया था क्योंकि इसके फेफड़ों में इंफेक्शन था. इलाज पर पांच लाख रुपये ख़र्च हुए, इसलिए हम सब इसे आश्रम का पंजलक्खा हार कहते हैं.'
यहां रहने वाले सुमेल और बलबीर लाइलाज बीमारी से पीड़ित हैं.
पालने में पड़ी तीन दिन की वंदना लुधियाना के पास डाबा में एक कूड़ेदान में पाई गई. उसकी आंखें नहीं हैं. सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक 12 साल की लड़की ने एक बेटी को जन्म दिया तो उसका परिवार बच्ची को यहां छोड़ गया.
दो दिन की प्रभसीरत को पडियाला में उसके परिवार ने एक कूड़ेदान के पास फेंक दिया. उसकी भी आंखें नहीं हैं.
अरमान के पालने के पास खड़े हो जाओ तो आप उसे गोद में लिए बिना रह ही नहीं सकते क्योंकि वो किसी को देखते ही पालने से बाहर निकलने की कोशिश करती है. गोद में आते ही उसकी बांछें खिल जाती हैं. इसके पिता उसे एक मोहल्ले के खाली प्लॉट में फेंक गए थे क्योंकि उनके पहले से दो बेटियां और एक बेटा था.
मनतेज नाम के लड़के को रेलवे स्टेशन पर एक बच्चा चोरी गैंग बेच रहा था तो पुलिस ने उन्हें धर लिया. वह तीन साल से यहां है.
खेतों में मक्के की लहलहाती फसल के बीचों बीच बने इस यतीमखाने में 47 बच्चे हैं. यहां बड़े लड़कों को नहीं लिया जाता है. इनमें तीन लड़के हैं और बाकी लड़कियां. ज़्यादातर बच्चों की आंखों में सपने और ऊर्जा देखकर लगता है कि कुछ करने के लिए ज़रूरी नहीं कि चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुआ जाए.
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